पाठ 1 / 3 | मध्यकालीन भारत / दिल्ली सल्तनत और मुगल
दिल्ली सल्तनत का प्रशासन
दिल्ली सल्तनत का प्रशासन
ढाँचा
दिल्ली सल्तनत (1206–1526) में मामलुक, खिलजी, तुगलक, सैयद और लोदी वंश आए। सुल्तान केंद्रीय था, पर वास्तविक नियंत्रण सैन्य शक्ति, दूरी और स्थानीय प्रतिरोध पर निर्भर था। दीवान-ए-वजारत वित्त-राजस्व, दीवान-ए-अर्ज सैन्य कार्य और दीवान-ए-इंशा शाही पत्राचार से जुड़े थे; दीवान-ए-रिसालत के कार्य कालानुसार बदल सकते थे। काजी और न्यायिक पद इस्लामी राजनीतिक-कानूनी ढाँचे के साथ स्थानीय प्रथाओं में काम करते थे।
इक्ता
इक्ता राजस्व-असाइनमेंट था। इक्तादार या मुक्ती को वेतन के बदले क्षेत्र से राजस्व लेने का अधिकार मिलता और उससे सैनिक तथा प्रशासन चलाने की अपेक्षा होती। यह सामान्यतः भूमि का निजी स्वामित्व नहीं था। केंद्र अधिकारी बदल, लेखे जाँच और अतिरिक्त राजस्व माँग सकता था। खालिसा भूमि सीधे केंद्रीय कोष के नियंत्रण में थी। इक्ता ने नकद नौकरशाही के बिना सेना चलाने में सहायता की, पर अधिक स्वायत्तता केंद्र के लिए चुनौती थी।
इल्तुतमिश ने सल्तनत सुदृढ़ की और इक्ता तथा चाँदी टंका और तांबे जीतल से जुड़ा है। अलाउद्दीन खिलजी ने बड़ी सेना, घोड़ों पर दाग, सैनिकों के चेहरा विवरण और बाजार नियंत्रण लागू किए। उसके राजस्व उपायों को मुगल जब्त से न मिलाएँ। मुहम्मद बिन तुगलक ने सांकेतिक मुद्रा, राजधानी स्थानांतरण और दोआब कर प्रयोग किए। फिरोज तुगलक नहरों, लोक-निर्माण और पदों की वंशानुगत प्रवृत्ति से जुड़ा है। 1526 के प्रथम पानीपत युद्ध में बाबर की विजय से लोदी शासन समाप्त हुआ।
त्वरित पुनरावृत्ति
पहले परिभाषा पहचानें और फिर उसे संबंधित संस्था, तिथि, प्रक्रिया तथा उदाहरण से जोड़ें। वैज्ञानिक तंत्र को नीति साधन, अंतरराष्ट्रीय पहचान को स्वतः घरेलू कानूनी दर्जा और पद को स्वामित्व न मानें। “हमेशा” तथा “केवल” जैसे पूर्ण शब्दों से सावधान रहें और बदलती संख्या या संस्करणों के लिए आधिकारिक स्रोत देखें।
उदाहरण से समझें
दिल्ली सल्तनत का प्रशासन — उपमा
इक्ता में अधिकारी को सेवा और सैनिक व्यवस्था के बदले जिले की आय लेने का अधिकार मिलता था, स्थायी स्वामित्व नहीं।