पियाजे के संज्ञानात्मक विकास की अवस्थाएँ
सवाल सीधे शब्दों में: ज्यां पियाजे ने कहा कि बच्चे छोटे बड़ों की तरह नहीं सोचते। उनका सोचना चार अवस्थाओं (stages) में बढ़ता है, और यह क्रम हमेशा एक ही रहता है। ये चार अवस्थाएँ कौन-सी हैं, किस उम्र में आती हैं, और हर अवस्था में बच्चा क्या कर पाता है और क्या अभी नहीं कर पाता?
इस पाठ के बाद आप:
- पियाजे की चारों अवस्थाओं के नाम क्रम से, उम्र के साथ बता सकेंगे
- बच्चे की बात या काम देखकर उसकी अवस्था पहचान सकेंगे
- वस्तु स्थायित्व, आत्मकेंद्रितता, जीववाद और संरक्षण को आसान शब्दों में समझा सकेंगे
- कक्षा 1 से 5 के बच्चों के लिए सही गतिविधियाँ चुन सकेंगे
1. कहानी: पानी के दो गिलास
सुनीता भीलवाड़ा के पास एक सरकारी स्कूल में पढ़ाती हैं। घर पर उनकी भतीजी पिंकी (6 साल) और भतीजा राजू (9 साल) खेल रहे हैं।
सुनीता एक जैसे दो गिलासों में बराबर पानी डालती हैं। दोनों बच्चे मानते हैं: "दोनों में बराबर है।"
अब उनके सामने वे एक गिलास का पानी लंबी, पतली बोतल में डाल देती हैं। पानी ऊपर तक चढ़ जाता है।
पिंकी चिल्लाती है, "बोतल में ज़्यादा है! देखो, कितना ऊपर है!"
राजू हँसता है, "नहीं, पानी वही है। बुआ ने बस उलट दिया है। वापस डालो तो गिलास फिर उतना ही भरेगा।"
इसी बीच छोटी गुड़िया (10 महीने) देखती है कि उसकी गेंद दुपट्टे के नीचे लुढ़क गई। वह घुटनों के बल जाकर दुपट्टा उठाती है और गेंद ढूँढ लेती है।
तीन बच्चे, सोचने के तीन तरीके। पियाजे की अवस्थाएँ तीनों को समझाती हैं।
2. पहला कदम: पियाजे का मुख्य विचार
- ज्यां पियाजे (Jean Piaget, 1896–1980) स्विट्ज़रलैंड के मनोवैज्ञानिक थे। उन्होंने अध्ययन किया कि बच्चे कैसे सोचते हैं।
- उनके अनुसार बच्चा दुनिया के साथ काम करके ज्ञान खुद बनाता है। बच्चा खाली घड़ा नहीं है जिसे भरना हो।
- बच्चा अपने विचारों को मन के ढाँचों में रखता है, जिन्हें स्कीमा (schema) कहते हैं।
- आत्मसात्करण (assimilation): नई चीज़ को पुराने स्कीमा में फिट करना। जो बच्चा "कुत्ता" जानता है, वह बछड़े को भी "कुत्ता" कह देता है।
- समायोजन (accommodation): जब बात फिट न हो, तो स्कीमा को बदलना। बच्चा सीखता है: "यह तो रँभाता है। यह बछड़ा है, कुत्ता नहीं।"
- साम्यधारण (equilibration): उलझन से फिर संतुलन में आना। इसी से सोच बढ़ती है।
3. दूसरा कदम: संवेदी-गामक अवस्था (जन्म से लगभग 2 वर्ष)
- शिशु इंद्रियों और हलचल से सीखता है (sensorimotor): देखना, छूना, चूसना, पकड़ना।
- इस अवस्था की बड़ी उपलब्धि है वस्तु स्थायित्व (object permanence): यह समझ कि कोई चीज़ आँखों से ओझल होने पर भी मौजूद रहती है।
- गुड़िया दुपट्टा उठाती है, क्योंकि वह जानती है कि गेंद अब भी वहीं है।
4. तीसरा कदम: पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था (लगभग 2 से 7 वर्ष)
- भाषा तेज़ी से बढ़ती है। बच्चा प्रतीकों (symbols) का उपयोग करता है: खेल-खेल में डंडी घोड़ा बन जाती है, पत्ता रोटी बन जाता है।
- आत्मकेंद्रितता (egocentrism): बच्चे को दूसरे के नज़रिए से दुनिया देखना कठिन लगता है। इसका मतलब स्वार्थी होना नहीं है।
- जीववाद (animism): बच्चा निर्जीव चीज़ों को सजीव मानता है। "चाँद मेरे साथ-साथ चल रहा है।"
- केंद्रीकरण (centration): बच्चा एक समय में केवल एक ही बात देखता है, जैसे पानी की ऊँचाई।
- संरक्षण की समझ अभी नहीं: पिंकी को लगता है कि लंबी बोतल में पानी ज़्यादा है।
- अनुत्क्रमणीयता (irreversibility): बच्चा किसी काम को उल्टा सोचकर ("वापस डालो") नहीं समझ पाता।
5. चौथा कदम: मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (लगभग 7 से 11 वर्ष)
- अब बच्चा असली, ठोस (concrete) चीज़ों के बारे में तर्क से सोच सकता है।
- संरक्षण (conservation): सिर्फ़ आकार बदलने से मात्रा नहीं बदलती। राजू जानता है कि पानी उतना ही है।
- उत्क्रमणीयता (reversibility): बच्चा किसी काम को उल्टा सोच सकता है।
- वर्गीकरण (classification): चीज़ों को समूहों में बाँटना, जैसे फल और सब्ज़ियाँ।
- क्रमबद्धता (seriation): चीज़ों को क्रम में रखना, जैसे डंडियों को छोटी से बड़ी तक।
- पर अमूर्त (abstract) बातें अभी कठिन हैं। बच्चे को वस्तुएँ, चित्र और असली उदाहरण चाहिए।
6. पाँचवाँ कदम: औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था (लगभग 11 वर्ष और ऊपर)
- बच्चा अमूर्त विचारों के बारे में सोच सकता है: न्याय, स्वतंत्रता, अक्षरों वाला बीजगणित।
- बच्चा "अगर ऐसा हो तो?" वाली स्थितियों पर सोच सकता है और विचारों को कदम-दर-कदम जाँच सकता है। इसे परिकल्पनात्मक-निगमनात्मक चिंतन (hypothetico-deductive reasoning) कहते हैं।
- उदाहरण: "अगर राजस्थान में कभी बारिश न हो, तो खेती का क्या होगा?" इस अवस्था का बच्चा बिना देखे इस पर तर्क कर सकता है।
7. याद रखने वाला चित्र: अवस्थाओं की सीढ़ी
- अवस्थाओं का क्रम हर बच्चे के लिए एक जैसा है। कोई अवस्था छूटती नहीं।
- उम्र केवल अनुमानित है। कोई बच्चा किसी अवस्था में थोड़ा पहले या थोड़ा बाद में पहुँच सकता है।
8. शॉर्टकट (समझने के बाद)
क्रम और उम्र: संवेदी – पूर्व – मूर्त – औपचारिक, और उम्र 0 – 2 – 7 – 11। हर अवस्था का एक शब्द: इंद्रियाँ → प्रतीक → ठोस तर्क → अमूर्त तर्क। वस्तु स्थायित्व = अवस्था 1। आत्मकेंद्रितता, जीववाद, केंद्रीकरण = अवस्था 2। संरक्षण, उत्क्रमणीयता, क्रमबद्धता = अवस्था 3। अगर-तो वाला चिंतन = अवस्था 4। कक्षा 1 से 5 (लगभग 6 से 11 वर्ष): ज़्यादातर बच्चे अवस्था 2 से अवस्था 3 में जा रहे होते हैं। असली चीज़ों से पढ़ाएँ।
9. कक्षा में इसे कैसे पढ़ाएँ
पहले असली चीज़ें: कंकड़, डंडियाँ, पत्ते, पानी और बोतलें। बच्चों को छूने, उँडेलने, छाँटने और गिनने दें। पानी वाला प्रयोग साथ करें: बच्चे खुद पानी डालें और उस पर बात करें। उत्तर सीधे न बताएँ। छाँटें और क्रम लगाएँ: बच्चों से बीजों को किस्म के हिसाब से छाँटने, या डंडियों को छोटी से बड़ी तक रखने को कहें। चिह्न से पहले चित्र: शब्द या अंक से पहले चित्र या वस्तु दिखाएँ। गलत उत्तर को स्वीकारें: 6 साल का बच्चा जो कहे "बोतल में ज़्यादा है", वह अपनी अवस्था के अनुसार सोच रहा है, लापरवाही नहीं कर रहा। उसे डाँट नहीं, और अनुभव दें।
कक्षा 2 की शिक्षिका "ज़्यादा" और "कम" पढ़ाना चाहती हैं। पियाजे के अनुसार सबसे अच्छा तरीका कौन-सा है?
उत्तर देखें
सही उत्तर: B
लगभग 7 साल के बच्चे असली, ठोस चीज़ों के साथ सबसे अच्छा सोचते हैं। करके और बात करके वे विचार खुद बनाते हैं।
विकल्प A: इस उम्र में परिभाषाएँ उतारने से समझ नहीं बनती।
विकल्प C: बिना समझे रटी बात जल्दी भूल जाती है।
विकल्प D: अमूर्त चिंतन बाद में, लगभग 11 वर्ष के बाद आता है।
संकेत: अमूर्त से पहले ठोस (concrete before abstract)।
10. झटपट जाँच
बच्चा पहली बार किस अवस्था में समझता है कि छिपाई गई वस्तु भी मौजूद रहती है?
उत्तर देखें
सही उत्तर: A
वस्तु स्थायित्व (object permanence) संवेदी-गामक अवस्था में, जन्म से लगभग 2 वर्ष के बीच बनता है।
विकल्प B: पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था में बच्चा यह पहले से जानता है; यहाँ नई बातें भाषा और कल्पना का खेल हैं।
विकल्प C: मूर्त अवस्था ठोस चीज़ों पर तर्क की है, जैसे संरक्षण।
विकल्प D: औपचारिक अवस्था अमूर्त और अगर-तो वाले चिंतन की है।
संकेत: गुड़िया और दुपट्टा।
5 साल का बच्चा कहता है, "चाँद मेरे साथ-साथ चल रहा है।" यह सोच की कौन-सी विशेषता है?
उत्तर देखें
सही उत्तर: B
जीववाद (animism) का अर्थ है निर्जीव चीज़ों को सजीव और भावनाओं वाला मानना। यह पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था (लगभग 2 से 7 वर्ष) की विशेषता है।
विकल्प A: संरक्षण यह समझ है कि आकार बदलने से मात्रा नहीं बदलती।
विकल्प C: क्रमबद्धता चीज़ों को क्रम में रखना है, जैसे छोटे से बड़ा।
विकल्प D: परिकल्पनात्मक-निगमनात्मक चिंतन औपचारिक अवस्था का अगर-तो वाला चिंतन है।
संकेत: चाँद को सजीव मान लिया गया।
मूर्त संक्रियात्मक अवस्था का लक्षण कौन-सी क्षमता है?
उत्तर देखें
सही उत्तर: C
मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (लगभग 7 से 11 वर्ष) में बच्चा समझता है कि केवल आकार बदलने से मात्रा नहीं बदलती।
विकल्प A: वस्तु स्थायित्व पहले, संवेदी-गामक अवस्था में आता है।
विकल्प B: कल्पना का खेल पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था की पहचान है।
विकल्प D: अमूर्त चिंतन औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था का है।
संकेत: राजू और लंबी बोतल।
पियाजे के अनुसार औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था लगभग किस उम्र से शुरू होती है?
उत्तर देखें
सही उत्तर: C
औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था लगभग 11 वर्ष से शुरू होती है। तब बच्चा अमूर्त और अगर-तो वाली स्थितियों पर सोच सकता है।
विकल्प A: लगभग 2 वर्ष पर पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था शुरू होती है।
विकल्प B: लगभग 7 वर्ष पर मूर्त संक्रियात्मक अवस्था शुरू होती है।
विकल्प D: 18 वर्ष पियाजे की किसी अवस्था की उम्र नहीं है।
संकेत: 0 – 2 – 7 – 11।
"आत्मकेंद्रितता का मतलब बच्चा स्वार्थी है।" नहीं। इसका मतलब है कि बच्चे को दूसरे के नज़रिए से चीज़ें देखना कठिन लगता है। "हर बच्चा ठीक एक ही उम्र में किसी अवस्था में पहुँचता है।" नहीं। क्रम तय है, पर उम्र अनुमानित है। "कक्षा 3 के बच्चे केवल परिभाषाओं से सीख सकते हैं।" नहीं। उनमें से ज़्यादातर मूर्त अवस्था में हैं और उन्हें असली चीज़ें और उदाहरण चाहिए।
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