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भारत का अपवाह तंत्र: हिमालयी और प्रायद्वीपीय नदियाँ

पाठ 2 / 22 मिनटमुफ़्त

दो अपवाह तंत्र

विशेषताहिमालयी नदियाँप्रायद्वीपीय नदियाँ
स्रोतहिमनद + मानसूनमुख्यतः मानसूनी वर्षा
प्रवाहबारहमासीअधिकतर मौसमी
घाटियाँगहरे गॉर्ज (पूर्ववर्ती)चौड़ी, उथली
मार्गविसर्पी, बदलतास्थिर, सीधा

हिमालयी तंत्र

  • सिंधु: मानसरोवर (तिब्बत) के निकट से; सहायक नदियाँ झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास, सतलुज। सिंधु जल संधि (1960) द्वारा नियंत्रित।
  • गंगा: भागीरथी (गंगोत्री हिमनद से) देवप्रयाग में अलकनंदा से मिलती है। सहायक: यमुना, घाघरा, गंडक, कोसी ("बिहार का शोक"), सोन।
  • ब्रह्मपुत्र: तिब्बत में सांगपो, अरुणाचल प्रदेश में दिहांग/सियांग, बांग्लादेश में जमुना।

प्रायद्वीपीय तंत्र

  • पूर्व की ओर बहने वाली (डेल्टा बनाती हैं, बंगाल की खाड़ी में): महानदी, गोदावरी (सबसे बड़ी प्रायद्वीपीय नदी, "दक्षिण गंगा"), कृष्णा, कावेरी।
  • पश्चिम की ओर बहने वाली (ज्वारनदमुख बनाती हैं, अरब सागर में): नर्मदा और तापी, जो भ्रंश घाटियों से बहती हैं।

प्रारंभिक परीक्षा बिंदु

  1. पश्चिमी घाट प्रायद्वीप का मुख्य जल-विभाजक है।
  2. हिमालय के उठने से पहले से बहने वाली नदियाँ (सिंधु, सतलुज, ब्रह्मपुत्र) पूर्ववर्ती नदियाँ हैं।

उदाहरण से समझें

हिमालयी नदियाँ विशाल ऊपरी टंकी (हिमनद) और वर्षा दोनों से जुड़े नल जैसी हैं; प्रायद्वीपीय नदियाँ उन बाल्टियों जैसी हैं जो केवल बारिश में भरती हैं। इसी कारण मई में भी गंगा बहती रहती है जबकि कई प्रायद्वीपीय नदियाँ पतली धार बन जाती हैं।

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