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भक्ति-सूफी आंदोलन

पाठ 3 / 32 मिनटमुफ़्त

भक्ति-सूफी आंदोलन

भक्ति

भक्ति में आराध्य देवता से व्यक्तिगत संबंध पर बल दिया जाता है। यह एक केंद्रीय संगठन वाला एकल आंदोलन नहीं था; क्षेत्र, भाषा, जाति और दर्शन के अनुसार रूप बदला। तमिल आलवार विष्णु और नयनार शिव के भक्त थे। सगुण में रूप-गुण वाले देवता और निर्गुण में निराकार परम तत्व की भक्ति पर बल है। कबीर ने कर्मकांड और संप्रदायगत विभाजन की आलोचना की। गुरु नानक ने ईश्वर-स्मरण, ईमानदार श्रम और बाँटकर खाने पर बल दिया। मीराबाई कृष्ण, तुलसीदास राम-भक्ति और चैतन्य बंगाल-ओडिशा की कृष्ण-भक्ति से जुड़े हैं। इनकी शिक्षाएँ समान नहीं थीं। लोकभाषा की कविता ने भागीदारी बढ़ाई, पर जाति या राजनीतिक पदानुक्रम हर जगह समाप्त नहीं हुआ।

सूफी परंपरा

सूफीवाद विविध इस्लामी आध्यात्मिक परंपराएँ हैं, जिनमें साधना, प्रेम, स्मरण, नैतिकता और ईश्वर के निकटता पर बल है। सिलसिला आध्यात्मिक वंश-परंपरा, खानकाह शिक्षा-निवास-सेवा का केंद्र और पीर या शेख मार्गदर्शक होता है। चिश्ती, सुहरावर्दी, कादिरी और नक्शबंदी भारत में सक्रिय थे। अजमेर के मोइनुद्दीन चिश्ती और दिल्ली के निजामुद्दीन औलिया चिश्ती परंपरा से जुड़े हैं; सेवा, प्रेम और कुछ संदर्भों में समा से उनका संबंध था। सुहरावर्दियों का कुछ संदर्भों में अभिजात वर्ग से खुला संबंध था। खानकाहें दान, भोजन और सामाजिक संपर्क का सहारा थीं, पर राज्य कार्यालय या हिंदू मंदिर नहीं।

भक्ति-सूफी परंपराओं ने लोकभाषा और सामाजिक संपर्क बढ़ाया, पर समन्वय शब्द से धार्मिक अंतर न मिटाएँ। आलवार-विष्णु, नयनार-शिव, कबीर, नानक, चिश्ती, सिलसिला-खानकाह और सगुण-निर्गुण याद रखें। खानकाह और दरगाह अलग हैं; दरगाह प्रायः संत की कब्र से जुड़ा तीर्थ है।

त्वरित पुनरावृत्ति

पहले परिभाषा पहचानें और फिर उसे संबंधित संस्था, तिथि, प्रक्रिया तथा उदाहरण से जोड़ें। वैज्ञानिक तंत्र को नीति साधन, अंतरराष्ट्रीय पहचान को स्वतः घरेलू कानूनी दर्जा और पद को स्वामित्व न मानें। “हमेशा” तथा “केवल” जैसे पूर्ण शब्दों से सावधान रहें और बदलती संख्या या संस्करणों के लिए आधिकारिक स्रोत देखें।

उदाहरण से समझें

भक्ति-सूफी आंदोलन — उपमा

भक्ति ईश्वर तक व्यक्तिगत मार्ग है; सूफी सिलसिला गुरु और परंपरा से निर्देशित आध्यात्मिक मार्ग। दोनों कविता और सेवा अपना सकते हैं, पर सिद्धांत अलग हैं।

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