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चयनित भारतीय चिंतकों में सार्वजनिक कर्तव्य और सामाजिक न्याय

पाठ 12 / 2712 मिनटPDF नोट्समुफ़्त

इस पाठ में आप क्या सीखेंगे

कौटिल्य के प्रजाहितकारी राजकीय परिश्रम और आंबेडकर के सामाजिक लोकतंत्र को अलग समझाएँ; संस्थागत उद्देश्य तथा नैतिक आधार की तुलना करके काल्पनिक कार्यालय में गति के भ्रामक माप और असमान पहुँच का निदान करें।

जाँच-प्रश्नों और उत्तर-लेखन सहित लगभग 35–50 मिनट रखें। चाहें तो दोनों चिंतकों के बीच विराम लें। मुख्य प्रश्न है: कार्यालय का काम किससे अच्छा बनता है, दिखाई देने वाले निपटान से, उसके सार्वजनिक उद्देश्य से या सेवा पाने वाले लोगों की हैसियत से? अलग ऐतिहासिक संदर्भों के ये चिंतक प्रश्न के अलग पहलू समझने में मदद करते हैं।

भाग क कौटिल्य और शासन का काम

प्रजाहित की दिशा में परिश्रम

अर्थशास्त्र के चुने हुए अंशों में राजा को आवेगों पर नियंत्रण, सलाहकारों की बात सुनने, प्रजा के काम देखने और अत्यावश्यक विषयों पर तत्काल ध्यान देने का निर्देश है। उसका हित प्रजा के हित से जुड़ा है। याचकों को उससे दूर रखने पर अव्यवस्था और शासन की कमजोरी बढ़ सकती है। ये राजतंत्र में शासक के कर्तव्य हैं; समान संवैधानिक नागरिकता का सिद्धांत नहीं। कौटिल्य, अर्थशास्त्र, अधिकरण 1, अध्याय 7 और 19, आर. शामशास्त्री के अनुवाद का आधुनिकीकृत इलेक्ट्रॉनिक अंश

यह केवल राजा की लंबे समय तक काम करने के लिए प्रशंसा करने से अधिक माँगता है। वह निजी रुचियों में व्यस्त रह सकता है, जबकि तात्कालिक सार्वजनिक समस्याएँ अनसुनी रहें। इसलिए परिश्रम किस काम में लग रहा है, यह महत्त्वपूर्ण है: वह शासन को उन जरूरतों के प्रति उत्तरदायी बनाए जिनके लिए शासन है। मंत्रणा उपयोगी है क्योंकि केवल प्रतिबद्धता से हर परिणाम या गलती नहीं समझी जा सकती। नीचे का उदाहरण इस संस्थागत अर्थ को खोलता है; वह प्राचीन राजकीय समय-सारिणी को आधुनिक कार्यालय में नहीं उतारता।

कल्पना करें कि पर्यवेक्षक दोपहर से पहले सौ फाइलों पर हस्ताक्षर करता है, लेकिन कभी नहीं पूछता कि इस ढेर में क्या पहुँचा ही नहीं। सलाहकार बताता है कि प्रवेश-काउंटर कठिन आवेदन लौटा देता है। प्रभावशाली आँकड़ा बनाए रखने के लिए पर्यवेक्षक सूचना अनदेखी करे, तो गति आवश्यक ध्यान की कमी छिपाती है। अप्रिय सूचना सुनना भी सक्षम पर्यवेक्षण का हिस्सा है। तात्कालिकता में विवेक चाहिए: समय-संवेदी शिकायत टालकर सामान्य कागज तेजी से निपटाना प्राथमिकताओं को उलट सकता है।

तर्क का क्रम। सार्वजनिक उद्देश्य काम को दिशा देता है; सुलभ पहुँच अधूरी जरूरतों की सूचना देती है; मंत्रणा और प्राथमिकता परिश्रम को प्रभावी बनाती हैं। इस व्याख्या में दक्ष दिखता काम भी विफल हो सकता है, यदि ध्यान माँगने वाले मामले ही बाहर हों। अंश से शासन के काम की जाँच का तर्क मिलता है; वर्तमान प्रशासन में राजतंत्र या उसकी सामाजिक श्रेणियाँ अपनाने का अधिकार नहीं।

कौटिल्य के तर्क की जाँच

जाँच 1। पर्यवेक्षक अपने पास पहुँचने वाली हर फाइल निपटा देता है। परिश्रमी लोकसेवा की दृष्टि से कार्यालय की प्रशंसा करने से पहले और क्या जानना चाहिए?

उत्तर। जानें कि कौन आवेदन कर पाया, किसका अनुरोध मेज तक पहुँचा ही नहीं, क्या अत्यावश्यक मामले टले और क्या बंद फाइलों में पर्याप्त उत्तर मिला। पूरा ढेर निपट जाना सभी की पहुँच का प्रमाण नहीं है।

शुद्धता का मानदंड। परिश्रम को प्रजा की जरूरत और सुलभ सुनवाई से जोड़ें; अधूरी कतार का निपटान और तेज करने की माँग भर से तर्क नहीं समझा जाता।

जाँच 2। क्या सलाह लेने से इन अंशों का राजा समान नागरिकों के प्रति उत्तरदायी संवैधानिक पदाधिकारी बन जाता है?

उत्तर। नहीं। सलाह राजतंत्र के भीतर शासक का निर्णय बेहतर कर सकती है। केवल उससे सत्ता का स्रोत या ढाँचा नहीं बदलता। सुनने की आधुनिक सीख को ऐतिहासिक राजनीतिक व्यवस्था से अलग समझना होगा।

शुद्धता का मानदंड। उपयोगी प्रशासनिक अभ्यास और सत्ता का आधार देने वाली व्यवस्था में अंतर करें।

भाग ख आंबेडकर और लोकतंत्र का सामाजिक आधार

समान नागरिकता व्यवहार में भी हो

25 नवंबर 1949 के संविधान सभा भाषण में भीमराव आंबेडकर ने राजनीतिक लोकतंत्र के लिए सामाजिक लोकतंत्र को आवश्यक बताया: रोजमर्रा के जीवन में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व साथ काम करें। उन्होंने समान राजनीतिक हैसियत तथा गहरी सामाजिक-आर्थिक असमानता का अंतर्विरोध पहचाना। बंधुत्व लोगों के साझेपन की भावना है, ऊपर से दिया गया उपकार नहीं। आंबेडकर का भाषण, संविधान सभा वाद-विवाद, 25 नवंबर 1949, अनुच्छेद 11.165.325–326

तीनों सिद्धांत काल्पनिक शिकायत-काउंटर पर लागू करें। स्वतंत्रता में शिकायत कहने की गुंजाइश हो, व्यक्ति को चुप न कराया जाए। समानता में सुनवाई माँगने की समान हैसियत हो; पता किसी के हीन होने का चिह्न न बने। बंधुत्व कर्मचारियों और अन्य आवेदकों से अपेक्षा करता है कि बाहर रखे गए व्यक्ति को सार्वजनिक जीवन का साथी मानें। ये सिद्धांतों के मौलिक प्रयोग हैं, भाषण में लिखे किसी सेवा-नियम का उद्धरण नहीं।

इन्हें साथ क्यों रखें? यदि सामाजिक बाधा कुछ लोगों को काउंटर तक ही न आने दे, तो बोलने के औपचारिक अवसर का अर्थ घट जाता है। बाधा हटा देना, लेकिन निर्णय पर हर प्रश्न रोक देना, दूसरा गंभीर दोष बचाए रखेगा। विनम्र अपवाद बनाकर एक व्यक्ति को प्रवेश देने से उसे मदद मिल सकती है, फिर भी बाकी लोगों की हैसियत निजी कृपा पर निर्भर रह सकती है। उपाय ऐसा हो जो कर्मचारी बदलने के बाद भी अगले पात्र आवेदक के काम आए।

इसीलिए दया बंधुत्व की जगह नहीं ले सकती। दया मदद की प्रेरणा दे सकती है, फिर भी मदद करने वाला अपने को ऊपर रखकर तय करे कि कौन करुणा का पात्र है। बंधुत्व व्यक्ति को प्रक्रिया पर समान दावा रखने वाला सदस्य मानने में सहायक है। शिकायत दर्ज कराने के लिए विशेष रूप से असहाय या कृतज्ञ दिखना जरूरी नहीं होना चाहिए। समान पंजीकरण का अर्थ हर शिकायत की सफलता भी नहीं है; उसके गुण-दोष की निष्पक्ष जाँच फिर भी होगी।

संस्थाएँ किसी प्रिय व्यक्तित्व पर निर्भर न रहें

इसी भाषण में राजनीतिक व्यक्तिपूजा से सावधान किया गया है और संवैधानिक उपाय उपलब्ध हों तो उन्हें अपनाने का आग्रह है। सामाजिक असमानता की आलोचना के साथ पढ़ें, तो यह लोकतांत्रिक संस्थाओं को प्रभावी बनाने की माँग है; हर बहिष्करण व्यक्तिगत रूप से दूर करने के लिए किसी लोकप्रिय नेता पर भरोसा करने की नहीं। आंबेडकर का भाषण, अनुच्छेद 11.165.323–325

हमारे कार्यालय में निदेशक का “अच्छे आवेदकों की मदद” का निजी वादा, स्पष्ट पंजीकरण-नियम, सुलभ समीक्षा और इनकार की जाँच से कमजोर है। प्रश्न है कि निदेशक के जाने के बाद भी पहुँच बनी रहेगी या नहीं। संस्थाओं को अच्छा आचरण करने वाले लोग चाहिए, लेकिन लोकप्रियता उस प्रक्रिया का विकल्प नहीं जिसे प्रभावित लोग इस्तेमाल कर सकें और जिस पर प्रश्न उठा सकें।

आंबेडकर के तर्क की जाँच

जाँच 3। कर्मचारी एक वंचित आवेदक पर दया करके विशेष कृपा से प्रवेश देते हैं। क्या बंधुत्व स्थापित हो गया?

उत्तर। नहीं। मदद महत्त्वपूर्ण हो सकती है, पर अन्य आवेदक कृपा पर निर्भर हैं। बहिष्करण की जगह ऐसी प्रक्रिया रखें जो सभी पात्र आवेदकों को समान माने। दावेदार की हैसियत कर्मचारी की सहानुभूति की मात्रा पर निर्भर न हो।

शुद्धता का मानदंड। समान सदस्यता और टिकाऊ प्रक्रियागत उपाय समझाएँ; मददगार भावना को ही गलत न बताएँ।

जाँच 4। कार्यालय सभी का पंजीकरण करता है, लेकिन निर्णय पर प्रश्न रोकता है। कौन-सी समस्या बची है?

उत्तर। समान प्रवेश मात्र से प्रश्न करने और बताई गई समीक्षा माँगने की सार्थक स्वतंत्रता नहीं मिलती। एक बाधा हटाकर दूसरी बनाए रखी जा सकती है। इस प्रकरण में पंजीकरण, निष्पक्ष विचार और समीक्षा साथ काम करें।

शुद्धता का मानदंड। स्वतंत्रता और समानता का संबंध समझाएँ; एक जैसा पंजीकरण हर लोकतांत्रिक मूल्य सुनिश्चित करता है, ऐसा न मानें।

उद्देश्य सुनवाई समानता और शासन सत्ता की तुलना

  • उद्देश्य: अर्थशास्त्र के चुने अंश प्रभावी, प्रजाहितकारी राजकार्य समझाते हैं; आंबेडकर पूछते हैं कि लोकतांत्रिक जीवन का सामाजिक आधार कैसे टिके
  • सुनवाई: सुलभ याचनाएँ शासक को सूचना देती हैं; वर्तमान लोकतांत्रिक प्रयोग में सुनवाई आवेदक की समान हैसियत को भी मान्यता देती है
  • समानता: लोकहित की साझा चिंता से सामाजिक श्रेणी या नागरिकता पर दोनों के विचार एक जैसे सिद्ध नहीं होते
  • शासन-सत्ता: पहला विवरण राजकीय शासन के कर्तव्यों से जुड़ा है; दूसरा संवैधानिक लोकतंत्र और उसके सामाजिक आधार से

इसलिए अच्छी तुलना एक व्यावहारिक सुधार के अलग कारण दे सकती है। प्रवेश की बाधा हटने से कार्यालय तक सूचना बेहतर पहुँचती है और हीन समझे गए लोगों को उचित मान्यता मिलती है। इस प्रकरण में कारण एक निर्णय का समर्थन कर सकते हैं; इससे दोनों राजनीतिक ढाँचे एक नहीं हो जाते।

हल किया हुआ प्रकरण प्रभावशाली निपटान दर वाला कार्यालय

यह वयस्कों का काल्पनिक शिकायत कार्यालय है; वास्तविक समुदाय के बारे में रिपोर्ट नहीं। एक महीने में 80 शिकायतें दर्ज होती हैं, जिनमें 72 बंद दिखाई जाती हैं और 90 प्रतिशत निपटान बताया जाता है। फिर जाँच से 20 अतिरिक्त पात्र आवेदन-प्रयास सामने आते हैं, जिन्हें प्रवेशकर्मी ने इसलिए रोका कि वयस्क आवेदक उस मोहल्ले के थे जिसे कर्मचारी झगड़ालू मानकर कलंकित करते हैं। उन शिकायतों के गुण-दोष अभी नहीं परखे गए हैं।

लिखित नीति समान पंजीकरण और समीक्षा देती है। अधिकारी पंजी जाँच सकता है, अनधिकृत रोक हटा सकता है, शिकायतकर्ताओं की बात सुन सकता है और पहुँच का परीक्षण कर सकता है। वह नीति के भीतर काउंटर-प्रक्रिया सुधार सकता है, लेकिन साक्ष्य चाहे जो हों, अनुकूल निर्णय का वादा नहीं कर सकता।

कार्य। बताएँ कि घोषित दर क्या छिपाती है। दोनों चिंतकों से अलग कारण दें और ऐसा उपाय बनाएँ जो कर्मचारियों को दयालु होने का भाषण देने से आगे जाए।

तर्कपूर्ण उत्तर। गणना का आधार केवल दर्ज शिकायतें हैं। कुल 100 प्रमाणित पात्र आवेदन-प्रयासों में 80 ही व्यवस्था में आए; 72 फाइलें बंद दिखने से यह सिद्ध नहीं होता कि हर उचित शिकायत को पर्याप्त उत्तर मिला। दिखाई देने वाला 90 प्रतिशत निपटान बहिष्करण के साथ चल सकता है। यहाँ तक कि 100 में 72 का व्यापक आँकड़ा भी संतोषजनक समाधान का माप नहीं है; फाइल बंद करने के आधार जाँचने होंगे।

मोहल्ले के आधार पर रोक हटाएँ और पंजीकरण की शर्तें स्पष्ट दिखाएँ। पहले बाहर किए गए आवेदकों को आवेदन करने दें, उनकी बात सुनें और अनुमत प्रक्रिया से शिकायतें आगे बढ़ाएँ। तारीख वाली पावती दें ताकि आवेदन का पता लगाया जा सके। इनकार के अभिलेख तथा बंद फाइलों का नमूना जाँचें; पहुँच की विफलता, समयबद्धता और उत्तर की गुणवत्ता अलग दर्ज करें। अधिकृत समीक्षा के माध्यम से प्रभावित आवेदकों की प्रतिक्रिया लें। इससे सुधार की जाँच संभव होगी; वह सद्भावना की सामान्य अपील पर निर्भर नहीं रहेगा।

कौटिल्य पर आधारित प्रयोग उस शासन की आलोचना करता है जो जरूरत छिपाता है और प्रासंगिक सलाह अनसुनी करता है। आंबेडकर पर आधारित प्रयोग समान हैसियत को पहुँची चोट पहचानता है: रहने के स्थान के कारण आवेदक को कमतर सहभागी नहीं माना जा सकता। पंजीकरण के बाद निपटान तेज करने भर से दूसरी समस्या नहीं सुधरेगी। प्रवेश देने के बाद प्रत्येक शिकायत साक्ष्य पर परखें; समान पहुँच समान परिणाम का वादा नहीं है।

परिवर्तित तथ्य। जाँच बताती है कि बहिष्करण पुरानी काउंटर-निर्देशिका में लिखा था, केवल प्रवेशकर्मी ने नहीं बनाया। समान पंजीकरण की नीति अब भी लागू है। विरोधी निर्देश वापस लें, उसके स्थान पर अधिकृत प्रक्रिया रखें, सभी प्रवेश-कर्मचारियों को समझाएँ और पहले के इनकारों की समीक्षा करें। उचित प्रक्रिया से कर्मचारी के आचरण के साथ पर्यवेक्षकीय जिम्मेदारी भी जाँचें। केवल प्रवेशकर्मी को फटकारने या बदलने से अगले कर्मचारी के लिए बहिष्करण की व्यवस्था बची रहेगी।

प्रकरण की स्वजाँच। पर्याप्त उत्तर गायब आवेदन पहचाने, फाइल बंद होने और गुणवत्तापूर्ण समाधान का अंतर करे, दो अलग कारण दे और नीति के भीतर प्रक्रिया सुधारे। पुराना निर्देश मिलने पर जिम्मेदारी का विश्लेषण बदले; संबंधित जाँच से पहले किसी को दोषी घोषित न करे।

गांधी से संदर्भयुक्त संबंध

हिंद स्वराज के अध्याय 17 में गांधी आपत्तिजनक कानून के प्रतिरोध को उसका पालन न करने और स्वयं दंड सहने की तत्परता से समझाते हैं। आंबेडकर का 1949 का भाषण संवैधानिक उपाय खुले होने पर सविनय अवज्ञा, असहयोग और सत्याग्रह का स्पष्ट विरोध करता है। दोनों स्थितियों को मिलाकर यह न कहें कि वे एक ही तरीका सुझाते हैं। राजनीतिक संदर्भ और प्रभावी संस्थागत उपायों की उपलब्धता महत्त्वपूर्ण हैं। गांधी, हिंद स्वराज, अध्याय 17, आत्मबल और कानून के पालन से इनकार की चर्चा; आंबेडकर का भाषण, अनुच्छेद 11.165.323

जाँच 5। क्या आंबेडकर का तर्क हर राजनीतिक परिस्थिति में हर विरोध को गलत सिद्ध करता है?

उत्तर। नहीं। बताए गए तरीकों, संवैधानिक संदर्भ और संवैधानिक उपाय खुले होने की शर्त को पहचानें। अंश हर तरह के विरोध को समाप्त नहीं करता, न गांधी और आंबेडकर की सहमति सिद्ध करता है। कार्यालय के प्रकरण में उपलब्ध अधिकृत सुधार और समीक्षा का उपयोग करें।

शुद्धता का मानदंड। संदर्भ की शर्त बताएँ और वास्तविक मतभेद बनाए रखें; कालातीत निषेध या कृत्रिम सहमति से बचें।

मुख्य परीक्षा अभ्यास

मौलिक अभ्यास प्रश्न: 5 अंक, 50 शब्द। शिकायत कार्यालय में सुधार के लिए कौटिल्य और आंबेडकर पर आधारित अलग कारण दें तथा एक संस्थागत उपाय बताएँ।

संकेतात्मक उत्तर। कौटिल्य प्रजाहित से राजकीय परिश्रम जोड़ते हैं; रुकी याचनाएँ जरूरत छिपाती हैं। आंबेडकर का सामाजिक लोकतंत्र स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व से समान नागरिक हैसियत माँगता है। भेदभावपूर्ण प्रवेश-निर्देश बदलें, पात्र शिकायतें दर्ज करें और इनकार जाँचें। अभिलेखों से बाहर रखे आवेदकों के रहते तेज निपटान न्याय का प्रमाण नहीं हो सकता।

अंक-विभाजन। कौटिल्य का आधार 1.5; आंबेडकर का आधार 1.5; संस्थागत उपाय 1; स्पष्टता 1। बताए गए अधिकार में उचित वैकल्पिक उपाय स्वीकारें। अलग आधार समझाए बिना दोनों को लोकहित का समर्थक कहना पर्याप्त नहीं है। यह मौलिक अभ्यास है, आधिकारिक आरपीएससी प्रश्न नहीं।

उदाहरण से समझें

प्रवेश-काउंटर किसी कार्यशाला के दरवाजे जैसा है: पूरे हुए काम गिनने से दरवाजे पर रोके गए लोगों का पता नहीं चलता। प्रवेश और भीतर का काम, दोनों जाँचें। उपमा गणना के अधूरे आधार तथा टिकाऊ प्रवेश-प्रक्रिया की जरूरत समझाती है। सीमा यह है कि नागरिक काम की वस्तु नहीं है: समान हैसियत, अपनी बात कहने और समीक्षा का अवसर केवल व्यवस्था से गुजरने वाली संख्या में नहीं समा सकते।

सूत्र और नियम

  • कौटिल्य: राजकीय शासन में परिश्रम, मंत्रणा और सुलभ सुनवाई
  • आंबेडकर: सामाजिक लोकतंत्र में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व साथ
  • लोकहित और समान नागरिकता शासन-सत्ता के एक जैसे आधार नहीं हैं
  • दया एक व्यक्ति की मदद कर सकती है, जबकि बहिष्करण बना रहे
  • पात्र आवेदन-प्रयास, पंजीकरण, समयबद्धता और गुणवत्ता अलग जाँचें
  • व्यक्ति के आचरण के साथ प्रक्रिया सुधारें; बताई गई नीति और समीक्षा-अधिकार का उपयोग करें
  • गांधी और आंबेडकर की तुलना में ऐतिहासिक संदर्भ तथा मतभेद स्पष्ट रखें

इस पाठ के नोट्स

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